Friday, October 22, 2021
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हज़ारीबाग मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल हुआ

मुख्यमंत्री का एलान, राज्य के मेडिकल कॉलेजों के नाम बदले

आवाज टीम
हजारीबाग मेडिकल कॉलेज का नाम शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल अब होगा । स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने इस बात का एलान किया।

अन्य मेडिकल कॉलेज के नाम भी झारखंड के विभिन्न विभूतियों के नाम करने का ऐलान हुआ । घोषणा के अनुसार पलामू मेडिकल मेडिकल कॉलेज का नाम अब मेदनीराय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, , दुमका मेडिकल कॉलेज का नाम फुलों झानो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल तथा पाटलिपुत्र मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का नाम शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल किया जा रहा है।

कौन हैं शेख भिखारी
कौन हैं शेख भिखारी, जिनके नाम से हजारीबाग मेडिकल कॉलेज का नाम यह मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का नामकरण हुआ है ।
शेख भिखारी
का जन्म सन् 1819 ई० में झारखंड के राँची जिला बुड़मो में हुआ था। वह सन् 1857 की क्रांति के दूसरे शहीद थे। 1857 की जंग ए आजादी में लड़नेवाले शेख भिखारी का जन्म 1831 ई में रांची जिला के होक्टे गांव में एक बुनकर अंसारी परिवार में हुआ था़।

बचपन से वह अपने खानदानी पेशा, मोटे कपड़े तैयार करना और हाट बाजार में बेचकर अपने परिवार की परवरिश करते थे़। जब उनकी उम्र 20 वर्ष की हुई तो उन्होंने छोटानागपुर के महाराज के यहां नौकरी कर ली। परंतु कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने राजा के दरबार में एक अच्छी मुकाम प्राप्त कर ली, बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उनको अपने यहां दीवान के पद पर रख लिया़।

शेख भिखारी के जिम्मे में बड़कागढ़ की फौज का भार दे दिया गया. 1856 ई में जब अंगरेजों ने राजा महाराजाओं पर चढ़ाई करने का मनसूबा बनाया तो इसका अंदाजा हिंदुस्तान के राजा-महाराजाओं को होने लगा था. जब इसकी भनक ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को मिली तो उन्होंने अपने वजीर पाण्डे गणपत राय, दीवान शेख भिखारी, टिकैत उमराँव सिंह से मशवरा किया ।

इन सभी ने अंगरेजों के खिलाफ मोरचा लेने की ठान ली और जगदीशपुर के बाबू कुँवर सिंह से पत्राचार किया. इसी बीच में शेख भिखारी ने बड़कागढ़ की फौज में रांची एवं चाईबासा के नौजवानों को भरती करना शुरू कर दिया ।

अचानक अंगरेजों ने 1857 में चढ़ाई कर दी। विरोध में रामगढ़ के रेजिमेंट ने अपने अंगरेज अफसर को मार डाला।

नादिर अली हवलदार और रामविजय सिपाही ने रामगढ़ रेजिमेंट छोड़ दिया और जगन्नाथपुर में शेख भिखारी की फौज में मिल गये। इस तरह जंगे आजादी की आग छोटानागपुर में फैल गयी। रांची, चाईबासा, संथाल परगना के जिलों से अंगरेज भाग खड़े हुए। इसी बीच अंगरेजों की फौज जनरल मैकडोना के नेतृत्व में रामगढ़ पहुंच गयी और चुट्टूपालू के पहाड़ के रास्ते से रांची आने लगे।

उनको रोकने के लिए शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह अपनी फौज लेकर चुट्टूपालू पहाड़ी पहुंच गये और अंगरेजों का रास्ता रोक दिया.। शेख भिखारी ने चुट्टूपालू की घाटी पार करनेवाला पुल तोड़ दिया और सड़क के पेड़ों को काटकर रास्ता जाम कर दिया। शेख भिखारी की फौज ने अंगरेजों पर गोलियों की बौछार कर अंगरेजों के छक्के छुड़ा दिये। यह लड़ाई कई दिनों तक चली।

शेख भिखारी के पास गोलियां खत्म होने लगी तो शेख भिखारी ने अपनी फौज को पत्थर लुढ़काने का हुक्म दिया। इससे अंगरेज फौजी कुचलकर मरने लगे।

यह देखकर जनरल मैकडोन ने मुकामी लोगों को मिलाकर चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ने के लिए दूसरे रास्ते की जानकारी ली। फिर उस खुफिया रास्ते से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ गये। अंगरेजों ने शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह को छह जनवरी 1858 को घेर कर गिरफ्तार कर लिया और सात जनवरी 1858 को उसी जगह चुट्टूघाटी पर फौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख भिखारी और उनके साथी टिकैत उमरांव को फांसी का फैसला सुनाया।

आठ जनवरी 1858 को आजादी को शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को चुट्टूपहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गयी।

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